प्यार में कभी कुछ भी गंदा नहीं होता

अगर आप पढ़ने के शौकीन हैं तो आते जाते रास्ते में टाइमपास के लिए कभी कोई पत्रिका या नॉवेल जरूर पढ़ा होगा, मैंने भी बहुत बार ऐसा साहित्य पढ़ा है। ऐसे साहित्य हमेशा नहीं पर अधिकतर टाइप्ड होते हैं, मसलन किसी हत्या या खजाने की मिस्ट्री सुलझाते चलताऊ भाषी उपन्यास, आप कभी ध्यान दीजिएगा इन उपन्यासों के शीर्षक बड़े कैची होते हैं, पढ़ते ही कथानक के प्रति उत्सुकता जगाने वाले, कातिल कौन? ढाई करोड़ का मुर्दा, विषकन्या का बदला, दफा 376, बलात्कारी बाबा वगैरह वगैरह ।

ganddi baat

युवा लेखक क्षितिज रॉय का उपन्यास ‘गंदी बात’ अपने शीर्षक की दृष्टि से वैसा ही कैची कहा जा सकता है, रही सही कसर आवरण पृष्ठ पर इसकी टैग लाइन ‘प्यार में कभी कुछ भी गंदा नहीं होता’ लिख कर पूरी कर दी गई है। बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, शीर्षक पक्का याद नहीं शायद ‘कागज के पुल’ था, किसी पति पत्नी की कहानी थी जो किसी बात से रुष्ट होकर बातचीत बंद कर देते हैं फिर कागज की पर्चियों पर एक दूसरे से वार्तालाप कर कथा को आगे बढाते हैं। ‘गंदी बात’ इसी तर्ज पर लिखा हुआ कह सकते हैं, पूरे उपन्यास में डेजी और गोल्डन के पत्रोत्तर हैं जो कथानक को आगे बढाते चलते हैं। दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं, डेजी दिल्ली के श्रीराम कॉलेज में पढ़ने आती है, कुछ दिनों में गोल्डन भी उसके पीछे पीछे दिल्ली आ जाता है। अजीब फिल्मी तरीके से डेजी के कॉलेज जा पहुंचता है, दिल्ली में आकर आजीविका के चक्कर मे ड्राइवर बनता है और किस्मत के फेर से ड्राइवर से गैंगस्टर बन जाता है।

केवल पत्र के सहारे कथानक को आगे बढ़ाने की दृष्टि से ये अनोखा प्रयोग कहा जा सकता है, पर इसके साथ कई सीमाएँ भी हैं जिनसे लेखक बहुत प्रयासों से भी उबर नहीं पाता। पूरे उपन्यास में ये कहीं जिक्र नहीं है कि ये पत्र वास्तव में पत्र ही हैं या व्हाट्सएप्प पर किया गया संवाद, अगर ये पत्र हैं तो इतना त्वरित रेस्पॉन्स आना कैसे सम्भव है? पर अगर ये व्हाट्सएप्प जैसे किसी तेज़ माध्यम पर की गई बातचीत है तब भी प्रश्न उठता है कि नायक या नायिका उन प्रसंगों को क्यों दोहरा रहे हैं जिनके वे दोनों ही साक्षी रह चुके हैं? केवल एक ही कारण समझ आता है कि लेखक ये पत्र नायक नायिका की और से एक दूसरे को नहीं लिखवा रहा बल्कि पाठक के लिए लिखवा रहा है, और येन केन प्रकारेण उसे उन घटनाओं से भी पाठक को परिचित करवाना ही है।

एक अन्य प्रसंग में जहाँ लेखक नायक नायिका के बीच की ‘गंदी बात’ का वर्णन करता है। सच कहूँ तो बड़ी असहज सी स्थिति मालूम होती है। दो प्रेमियों के बीच ऐसी ‘गंदी बात’ होना, सीधे शब्दों में कहूँ तो सेक्स का होना बड़ी स्वाभाविक सी बात है पर जिस तरह से इसे लिखा गया है उसने इसे अजीब बना दिया है। दो लोगों के अंतरंग पल जिसके प्रत्येक क्षण को उन दोनों ने हृदय की गहनता से अनुभूत किया है, उसे नायिका के पत्र में इस तरह लिखा जाना प्रेम नहीं उसे किसी ‘मस्तराम’ की सस्ती क़िताब का बेहूदा प्रसंग बना डालता है। अगर उस प्रसंग का संकेत भर भी किया जाता तब भी पाठक सब समझ जाता पर शायद लेखक ‘गंदी बात’ शीर्षक का औचित्य सिद्ध करने में जरूरत से ज्यादा बहक गए हैं।

भाषा के स्तर पर ‘गंदी बात’ क्षितिज रॉय के भाषिक कौशल का शानदार उदाहरण है, किसी भी स्तर पर पात्रों ने अपना मूल चरित्र का त्याग नहीं किया है, बहुत सी ऐसी जगहें हैं, जहाँ आप गोल्डन और डेजी के संग मुस्कुरा सकते हैं, उनके मन के भावों को अपने मन में कहीं गहरे उतरते और अनुभूत होते देख सकते हैं। गोल्डन की नादानियाँ आपको भी क्यूट लगेंगी और अगर आप भी किसी से प्रेम करते हैं तो कम से कम एक बार वैसी ही कोई बेवकूफी करने का आपका मन भी जरूर करेगा। उपन्यास दिल्ली के अन्ना आंदोलन और केजरीवाल के उदय की पृष्ठभूमि में लिखा गया है, उस आंदोलन के समानांतर फलते इस प्यार को लेखक ने खूबसूरती से चित्रित किया है। पूरी तरह से फिल्मी इस लव स्टोरी को लेखक ने किसी फिल्म की ही तरह से दृश्यांकित किया है।

गंदी बात, कम से कम एक बार तो जरूर पढ़ी जानी चाहिए। सिर्फ अच्छी बातें सीखने के लिए नहीं कुछ त्रुटियों से बचे रहने के लिए भी इसे पढ़ा जा सकता है।


समीक्षक :  अरुण राजपुरोहित


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